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चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि ही सृष्टि की जन्मतिथि: गहलोत

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सिरसा। महर्षि स्वामी दयानंद ने बताया कि वेद के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को ही सृष्टि की जन्मतिथि है। इस दिन परमपिता परमेश्वर ने सृष्टि की रचना की थी, इसी दिन सूर्य की पहली किरणों ने पदार्पण किया था। इसी कारण इस दिन का नाम रविवार रखा गया है। भारतीय नए संवत्सर का आरंभ चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होता है। ये अत्यंत पवित्र तिथि है। प्रतिपदा प्रथम तिथि को कहते हैं। ये शब्द आर्यसमाज बेगू रोड सिरसा के कार्यकारी प्रधान भूप सिंह गहलोत ने हवन यज्ञ व वैदिक सत्संग के समय कही। उन्होंने बताया कि भारत का सर्वमान्य सम्वत विक्रमी सम्वत ही है जिसका आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। विक्रमी सम्वत का नामकरण सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर हुआ था। उन्होंने उज्जैन के शाक्यों पर अपने विजय के उपलक्ष्य पर इस सम्वत का नामकरण किया। इस सम्वत का आरंभ इसा से 57 साल पूर्व किया गया था लेकिन इसके बावजूद हमारी मान्यता के प्रति हीनभावना तथा महज 2 हजार वर्ष पुरानी ईसायित सभ्यता के प्रति आकर्षण होना बड़ा चिंतनीय है। महर्षि दयानंद सरस्वती ने इसी दिन 1875 में मुंबई के स्थान पर आर्यसमाज की स्थापना की थी। विश्वभर की आर्यसमाजों में यह दिन बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक भी इसी दिन किया गया था। इसलिए हर भारतीय विशेष तौर पर आर्यसमाज 1 जनवरी की बजाए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही नववर्ष मानता है। इससे पूर्व हवन यज्ञ किया गया। शनिवार को यज्ञ ब्रह्मा भूपसिंह गहलोत थे। यजमान का दायित्व सुधाकर शर्मा ने निभाया। कार्यक्रम में वरिष्ठ भाजपा नेता रमेश जैन मुख्यातिथि थे जबकि विशिष्ट अतिथि प्रो. सुभाष वर्मा थे। अध्यक्षता विजयपाल सैनी ने की। इस अवसर पर डॉ. आरके निजात, धर्मवीर सिंह बलियान, बलराज आर्य, त्रिलोकीनाथ मित्तल, समाजसेवी डॉ. लूथरा, पूर्व प्रबंधक राजकुमार वर्मा, पूर्व प्रबंधक गंगाराम वर्मा, लक्ष्मी देवी, कौशल्या आर्या, रोहित वर्मा, बाबूराम सैनी, ओमप्रकाश आर्य, कन्हैया, पार्थिक, विष्णु, लविश आर्य व अनमोल सिंह सहित अनेक आर्यजन मौजूद थे। अंत में सभी को त्रिलोकीनाथ मित्तल द्वारा सभी को ब्रह्मभोज करवाया गया।

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